Ankahi..

by Vivek Jain

1.

जब उम्र बढ़ रही थी, जीने का सलीक़ा समझ रहे थे,
जब जीना सीख लिया तब उम्र बढ़ चुकी थी।
अक्ष ढलते सूरज को देख, ज़िंदगी की यह लंबी दानिश अब समझ रहे थे.
उम्र की यह उलझन समझ आई तो नहीं, पर वक्त ने रिश्तों की एहमियत समझा दिया.

2.

वक़्त के खेल में ना जाने कहा चल पड़े।
होश ना रहा कितनी देर आएगी.
मुड़ कर देखा, सपना सा लगा।
यादों के बादल मैं दिखे
वो हसीन लम्हे, वो मुस्कुराहट, वो बचपन, वो बेफिक्री, वो यारियां।
ये कल ही तो था!
आँखे नम हुए, एक उदास दिल लिए
अस्ससे इबादत की
ये खुदा आज मुआफ़ करना
तेरे घर से कुछ हसीन लम्हे चुराने का ख्याल आया है।

3.

यु ना पिला साकी प्याला भरा शराब का,कम्भखत मुद्दते बीत जाएगी बताते नशा किसका था।

 4.

वाहा थोड़ा था, पर बहुत था
यहाँ सब कुछ था पर कुछ कम था।
वो ख़ुश थे
और मैं खुशियाँ ढूंढ रहा था।

5.

दिखाई दे चेहरे पर एक तबस्सुम, मुतलक़ सिफ़र सी ज़िंदगी मैं भी फ़लाह रोशन हो जाती है।

6.

वजह ये कोई कम तो नहीं खुशियां पाने के लिए..
अपनो के संग मुस्कुरातें रहे और कुछ हसीन लम्हे बस यू ही जी ले।