Vivek Jain
नशा पैमाने मैं नहीं है, बस वह दो चार ही बहुत है.
हाले दिल बयान तो करदे, बस वह दो चार ही बहुत है.
तक़दीरें तारीख़ों से बदलती नहीं आज़मा कर देख बन्दे , यू भी देखा है तद्दबीर वक़्त को बदलते हुए।
खूबसूरत लम्हों को दोहराने की ख्वाइश है आपकी
माज़ी को रूह देने की आदत है हमारी
हम वही हैं जहां मैखानें थे
गुम नाम तो वोह हुए जिन्हें दोस्त कह बैठें
कोन कहा जा रहा है इस भरी भीड़ मैं
अंजान है यहाँ सब इस भरी भीड़ मैं
कहने को तो इतने है यहाँ
फिर भी अकेला हूँ इस भरी भीड़ मैं.
एक पल कुछ कहकर यूँ निकला
यादों के लम्हों मैं फिर ऐसा कुछ हुआ
रिम झीम वह बारिश की ख़ुशबू,
पतझड़ की लहराती ज़मीन पर वह पत्तियाँ,
कड़ कड़ाती वह सर्द हवाएँ
दूर धुंधला सा चेहरा दिखा, दिल मैं कसक सी उठी,
एक पल कुछ कहकर यूँ निकला.
आईने मैं ख़ुद को देखता रहा,
वक्त कब गुज़र गया यह आईना भी कह ना सका.
आईने से गुफ़्तगू तो शुरू की हमने,
होश यह ना रहा, हाले बयान ख़ुद से कर बैठे.